सफरनामा।

जब जागा तो रात यूं बरसी,

सवेरा देखने आखे तरसी।

खुशनुमा से इस माहौल में यूं जो लोग आए,

हस्ते हस्ते नजाने कब रुला जाए।

ये वक्त ये लम्हा ही तो था एक मेरा,

हस्ते हस्ते कुछ चंद पलों में ही सिमट गया।

इस सन्नाटे में शोर सुन सुन के,

अब शोर भी चुप हो गया।

 

डरता था सोच कर की क्या कहूं किस्से कहूं,

इतनी भीड़ में भी खुद को अकेला पाने लगा था।

ये समझ कर की वो है मेरे साथ,

मै खुद को खुद से ही दूर पाने लगा था।

ना इरादे बुलंद थे, ना मंज़िल साफ थी,

पैगाम नजाने किस मोड़ पे ले जाने लगा था।

 

लोगो ने कहा चला जा उस राह, मिलेगा स्वर्ग तुझे,

"पर रास्ता अगर वहीं था तो तुम क्यों रुके?"

 

यूं तो चल पड़ा मै इन कभी ना ख़तम होने वाले रास्तों पे,

बिना समझे कि मंज़िल तो कभी थी ही नहीं,

बनाना था मुझे उसे अपने कर्मो से।।

 

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